Thursday, August 21, 2025

बिहार का वर्तमान हालात और चुनाव: जागो मेरे बिहार!

बिहार… यह सिर्फ़ एक राज्य नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और संघर्ष की धरती है। यहाँ की मिट्टी ने बुद्ध दिए, चाणक्य दिए, जयप्रकाश दिए। लेकिन आज जब हम चारों ओर नज़र डालते हैं, तो दिल सवाल पूछता है – क्या यही है वो बिहार जिसका सपना हमने देखा था?

वर्तमान तस्वीर: एक कड़वा सच

  • शिक्षा: लाखों बच्चे आज भी टुटे-फूटे बेंचों पर बैठकर सपनों की उड़ान भरना चाहते हैं, लेकिन उनके पंख अधूरी किताबें और अनुपस्थित शिक्षक काट देते हैं।

  • स्वास्थ्य: एक आम आदमी बीमार पड़ जाए, तो उसे या तो जेब खाली करनी पड़ती है या जिंदगी दांव पर लगानी पड़ती है। गाँवों के अस्पतालों में दवा नहीं, डॉक्टर नहीं।

  • रोज़गार: हमारे नौजवान, जो कल बिहार का भविष्य थे, आज मज़दूर बनकर दिल्ली, पंजाब और मुंबई की सड़कों पर भटक रहे हैं। माँ-बाप का आँगन खाली हो रहा है, गाँव वीरान हो रहे हैं।

  • विकास: कुछ पुल और सड़कें बनीं हैं, बिजली के खंभे खड़े हुए हैं, लेकिन सवाल है – क्या यही असली विकास है? पेट भरा? रोज़गार मिला? भविष्य सुरक्षित हुआ?

चुनाव: उम्मीदें या सिर्फ़ नारे?

हर चुनाव में वही कहानी दोहराई जाती है। मंच से नेताओं की आवाज़ गूंजती है – “हम बदल देंगे बिहार!”
लेकिन चुनाव बीतते ही, ये आवाज़ें हवा में खो जाती हैं।
जाति, धर्म और खोखले वादों के जाल में हम फँस जाते हैं और अगले पाँच साल फिर वही तकलीफ़ें झेलते हैं।

आम इंसान क्या करे?

बिहार की तक़दीर सिर्फ़ नेताओं से नहीं बदलेगी, यह बदल सकती है तो आप और हमसे।

  1. वोट को हथियार बनाएँ – किसी जाति या रिश्ता-नाते से नहीं, काम और ईमानदारी से वोट करें।

  2. नेताओं से सवाल पूछें – अस्पताल क्यों खाली हैं? युवाओं को रोज़गार क्यों नहीं? पढ़ाई क्यों अधूरी?

  3. युवा शक्ति को जगाएँ – बिहार का असली खज़ाना उसके नौजवान हैं। अगर नौजवान जाग गए, तो कोई ताक़त बिहार को रोक नहीं सकती।

  4. छोटे-छोटे कदम उठाएँ – मोहल्ले की सफ़ाई से लेकर पंचायत की बैठकों तक, बदलाव की शुरुआत खुद से करें।

जागो बिहार!

बिहार हमेशा जागरण की भूमि रहा है। अगर बुद्ध ने यहाँ ज्ञान की रोशनी फैलाई, अगर जयप्रकाश ने यहाँ से क्रांति की चिंगारी उठाई, तो आज हम क्यों सोए रहें?

बिहार बदलेगा, अगर आम इंसान बदलेगा।
बिहार उठेगा, अगर नौजवान उठेगा।
बिहार चमकेगा, अगर वोट जाति से नहीं, मुद्दों से डाले जाएँगे।

अब वक़्त आ गया है कि हम सिर्फ़ दर्शक न रहें, बल्कि अपने बिहार की किस्मत के निर्माता बनें।

Tuesday, August 12, 2025

"टूटे वादों का टैक्स"


साल के बारह महीने…
गाँव के उस छोटे से घर में बैठा मैं, जेब में पड़े सिक्कों को गिन-गिनकर, एक पुराने टिन के डिब्बे में भरता था।
कोई चोरी न कर ले, इसलिए उसे कपड़ों के नीचे, अलमारी के कोने में छुपा देता।

पूरे साल की मेहनत और बचत का मकसद बस एक था — दिवाली का मेला
उस दिन सोचता, “एक रंगीन पटाखा लूंगा, मीठा पान  और अगर पैसे बचे तो गुब्बारा भी।”

हमारे गाँव में खुशियों की कीमत पैसों में नहीं, दानों में मापी जाती थी।
बरफ या सोनपापड़ी के लिए खेत से लाए मकई, धान या गेहूँ देकर मिलता।

आज मैं गाँव से दूर, एक किराए के छोटे से कमरे में अकेला रहता हूँ।
जी-तोड़ मेहनत करता हूँ — दिन में दफ्तर की भाग-दौड़, रात में लैपटॉप पर कोडिंग।
परिवार से दूर, चिंताओं से घिरा, और महंगाई के बोझ तले दबा हुआ।

हर महीने हिसाब लगाता हूँ कि कहां से 2 रुपये भी बचा सकूँ।
लेकिन महंगाई मुझे एक-एक सांस पर टैक्स वसूल लेती है।

  • सब्ज़ी पर टैक्स

  • बिजली के बिल पर टैक्स

  • मोबाइल रिचार्ज पर टैक्स

  • और सबसे ऊपर… मेरी मेहनत की कमाई से इनकम टैक्स

इतना टैक्स देने के बाद भी जब गाँव जाता हूँ, दिल बैठ जाता है।

  • वही टूटी सड़कें

  • वही अंधेरा जब बिजली जाती है

  • वही अस्पताल, जिसमें दवाई नहीं

  • वही स्कूल, जहां बच्चे टूटी बेंच पर बैठते हैं

मेरे अपने रिश्तेदार आज भी इलाज के लिए शहर भागते हैं।
बच्चे अच्छी पढ़ाई के लिए घर से दूर भेजे जाते हैं।

टैक्स किसके लिए?

टीवी चालू करो, तो देखो —
मंत्री का बेटा विदेश में पढ़ रहा है, बेटी की शादी में करोड़ों के हीरे, और पाँच सितारा होटल में भोज।
विदेशी दौरों पर “अध्ययन यात्रा” के नाम पर मौज-मस्ती।

ये वही लोग हैं, जो चुनाव के वक्त मेरे गाँव में आकर हाथ जोड़ते थे —
"हम गरीबों के सेवक हैं, हमें मौका दो।"

लेकिन सच ये है —
हम अपने लिए नहीं, उनके ऐशो-आराम के लिए कमाते हैं।

रात को अपने छोटे से कमरे में बैठा, चाय की चुस्की लेते हुए मैं सोचता हूँ —
"क्या मेरा टैक्स किसी बच्चे की किताब बनेगा…
या किसी नेता की हवेली की छत?"

और फिर याद आता है —
मेरे गाँव की वो मिट्टी, जहाँ मैंने बचपन में अपने सपनों के लिए 10 रुपया सालभर में जोड़े थे…
आज मेरी पूरी सैलरी से कटे टैक्स के बाद भी, वहाँ ज़िंदगी जस की तस है।

ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं।
ये हर उस इंसान की कहानी है, जो गाँव-शहर में मेहनत करता है, टैक्स देता है… और बदले में टूटी सड़कें, टूटा सिस्टम और टूटे वादे पाता है।

Saturday, July 19, 2025

AI की तेज़ रफ्तार और भारत की धीमी शिक्षा व्यवस्था: अनहोनी के संकेत

"भविष्य वही होता है जिसे हम आज बनाते हैं, लेकिन जब वर्तमान ही गुमराह हो तो भविष्य किस दिशा में जाएगा?"

आज का युग तकनीकी क्रांति का युग है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) — एक ऐसी तकनीक जिसने कुछ ही वर्षों में पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है। जिस कार्य को एक मनुष्य वर्षों की मेहनत और अनुभव से करता है, AI उसे चंद मिनटों में सीखकर उससे बेहतर ढंग से कर रहा है। आज AI एजेंट्स कई मामलों में इंसानों से आगे निकल चुके हैं — निर्णय लेने में, विश्लेषण करने में, और यहां तक कि रचनात्मकता में भी।

AI ने अभी अपने विकास की शुरुआत ही की है, लेकिन इसकी गति को देख कर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब यह अपने चरम पर होगा तो दुनिया का स्वरूप ही बदल जाएगा। लेकिन ऐसे में एक बड़ा और चिंताजनक सवाल उठता है — क्या हमारे बच्चे, विशेषकर भारत के पिछड़े और ग्रामीण इलाकों के बच्चे, इस तकनीकी बदलाव के लिए तैयार हैं?

ग्रामीण भारत और शिक्षा की सच्चाई

हमारे देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी गांवों और छोटे कस्बों में बसता है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है। स्कूलों में अभी तक बुनियादी सुविधाएं — जैसे साफ़ पानी, शौचालय, बिजली — तक उपलब्ध नहीं हैं, तो कंप्यूटर शिक्षा की बात तो दूर की कौड़ी हो गई।

आज के सरकारी स्कूलों में बच्चे कागज़-पेन से पढ़ते हैं, वहीं विकसित देशों में बच्चे रोबोटिक्स और कोडिंग सीख रहे हैं। देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्होंने अब तक कंप्यूटर को छूना तक नहीं सीखा, जबकि उसी उम्र के विदेशी बच्चे AI मॉडल बना रहे हैं। यह अंतर सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई को और चौड़ा कर रहा है।

सरकार की उदासीनता और राजनीतिक स्वार्थ

देश की शिक्षा व्यवस्था को अगर किसी ने सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है तो वह है राजनीति। हमारे नेताओं की प्राथमिकता कभी भी शिक्षा नहीं रही। शिक्षा में सुधार का वादा हर चुनाव में किया जाता है, लेकिन उसके बाद बस वादाखिलाफी और भ्रष्टाचार देखने को मिलता है।

हर साल शिक्षा के लिए भारी भरकम बजट पास होता है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा भ्रस्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। नेता अपना जेब भरते हैं, ठेकेदार अधूरी इमारतें बनाते हैं, और शिक्षा वहीं की वहीं रह जाती है। अगर कुछ किया भी जाता है तो बस दिखावे के लिए — ताकि वोट लिया जा सके, असली सुधार की नीयत कहीं नहीं दिखती।

AI बनाम Reel: बच्चों की दिशा और चिंता

आज का बच्चा मोबाइल फोन से घिरा हुआ है — शिक्षा नहीं, रील्स और गेम्स में उलझा हुआ। सोशल मीडिया के आभासी चमक-दमक ने सोचने-समझने की क्षमता पर असर डाला है। जब तक शिक्षक बच्चों को AI का उपयोग सिखाएंगे, तब तक बच्चों को तो ये भी नहीं पता होगा कि AI होता क्या है।

ये स्थिति बेहद चिंताजनक है। देश का भविष्य अगर इस तरह के डिजिटल व्यसन में डूब गया, और सही मार्गदर्शन ना मिला, तो हम सिर्फ तकनीकी तौर पर ही नहीं, सामाजिक और मानसिक तौर पर भी पिछड़ जाएंगे।

समाधान की ओर: अब भी समय है

हालात बेशक निराशाजनक हैं, लेकिन पूरी तरह अंधकारमय नहीं। कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जो सरकार, समाज, और हम सभी नागरिकों को मिलकर उठानी होंगी:

  1. शिक्षा को राजनीतिक एजेंडा नहीं, प्राथमिक ज़रूरत मानें।
    बजट और योजनाएं ईमानदारी से लागू हों, यह सुनिश्चित किया जाए।

  2. ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता फैलाना।
    NGOs और टेक कंपनियों को साथ जोड़कर गांवों तक कंप्यूटर, इंटरनेट और AI की मूलभूत समझ पहुंचाई जा सकती है।

  3. शिक्षकों का प्रशिक्षण और नई टेक्नोलॉजी से लैस करना।
    जब तक शिक्षक खुद अपडेट नहीं होंगे, वे बच्चों को कैसे तैयार करेंगे?

  4. बच्चों के लिए सही डिजिटल दिशा तय करना।
    सिर्फ रील्स और गेम्स नहीं, बल्कि बच्चों को कोडिंग, रोबोटिक्स, और सृजनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करना।

AI कोई कल्पना नहीं, यह सच्चाई है — और यह सच्चाई तेज़ी से हमारी दुनिया बदल रही है। ऐसे में यदि हम आज अपनी शिक्षा व्यवस्था को नहीं सुधारते, तो आने वाला समय हमारे बच्चों के लिए सिर्फ संघर्ष और असमानता से भरा होगा।

अब भी समय है।
शुरुआत छोटे स्तर से हो सकती है — एक गांव, एक स्कूल, एक बच्चा। लेकिन अगर इरादा साफ़ है तो बदलाव निश्चित है।

“तकनीक से डरने की नहीं, उसे समझने और अपनाने की ज़रूरत है। लेकिन जब तक समझ होगी नहीं, अपनाएंगे कैसे?”

 पूरा पढ़ने के लिए दिल से धन्यवाद, अपना सुझाव अवश्य दे और एक सबसे जरूरी, इस विषय में एक बार सोचे जरूर। शायद आपके अपने किसी शहर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहे है लेकिन वो बच्चे भी अपने ही है जो सरकारी स्कूलों के बीच अपने अबोध मन में सुंदर भविष्य का कल्पना लिए बैठे है। 

🖋देवचंद्र ठाकुर  
📧 thakur.devchandra7@gmail.com


Friday, May 30, 2025

 शीर्षक: चाँदनी रात और चाँद वाली बूढ़ीया

(19वीं सदी के बिहार के एक गाँव की कहानी)

यह कहानी है 1998-99 के आसपास बिहार के एक छोटे से गाँव की। दिसंबर की सर्द रात थी। आसमान एकदम साफ़ था, जैसे किसी ने नीले काग़ज़ पर दूधिया चाँद को टांग दिया हो। पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा था। न कोई बिजली थी, न कोई रोशनी — बस चाँद की चाँदनी हर घर, हर पेड़, हर खेत को नहला रही थी।

गाँव के एक किनारे पर मिट्टी का एक पुराना सा घर था। उस घर के आँगन में एक छोटा सा लड़का — बबलू — अपने पुराने कम्बल में लिपटा हुआ ज़मीन पर लेटा था। उसकी आँखें आसमान की ओर टिकी थीं। वो चाँद को एकटक निहार रहा था।

उसे अपनी दादी की कही हुई एक कहानी याद आ रही थी —
“चाँद में एक बूढ़ीया रहती है, जो एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठी चरखा कातती रहती है। जब चाँद साफ़ होता है, तो वो बूढ़ीया दिखाई देती है। कभी-कभी वो थककर रुक जाती है, लेकिन उसका चरखा चलता रहता है।”

उसने ध्यान से देखा — और हाँ! उसे चाँद की सतह पर कुछ आकृतियाँ दिखाई दीं। वो आकृति सचमुच किसी पेड़ जैसी थी... और उसके नीचे बैठी एक छोटी सी परछाईं — बिल्कुल वैसी ही जैसी दादी बताया करती थीं — चुपचाप चरखा कातती एक बूढ़ीया।

बबलू का दिल भर आया।
उसे लगा जैसे वह कहानी कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है।

वो सोचने लगा, “क्या सच में चाँद पर कोई है?”
फिर उसकी नज़र आँगन के कोने में फैले एक मकड़ी के जाले पर पड़ी — वो जाला चाँदनी में चमक रहा था, और वो रेशमी धागा किसी चरखे के धागे जैसा लग रहा था।

उसे लगा जैसे वह धागा उसी चाँद वाली बूढ़ीया के चरखे से गिरा हो, जो यहाँ धरती तक चला आया हो — कभी पेड़ की शाख पर लिपटा हुआ, कभी खेतों में पसरा हुआ, कभी दो दीवारों के बीच टँगा हुआ।

उसी रात बबलू ने ठान लिया —
"जब मैं बड़ा होऊँगा, मैं उस बूढ़ीया की कहानी सबको सुनाऊँगा। मैं सबको बताऊँगा कि चाँद सिर्फ़ रौशनी नहीं, वो हमारे बचपन की कहानियों का घर है, हमारी दादी-नानी की कल्पना का जादू है।”

और उस दिन के बाद से हर चाँदनी रात में बबलू चुपचाप आँगन में लेटकर चाँद को निहारता। उसे अब सिर्फ़ चाँद नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया दिखती — जहाँ बूढ़ीया चरखा कातती थी, और उसका धागा बबलू के सपनों में उतरता था।

 दादी के कांधे और दादाजी के हाथ



पता है, पुरानी हर चीज़ में अगर सबसे प्यारी कोई चीज़ रही है, तो वो है दादी-दादाजी का प्यार।

बचपन की बहुत-सी बातें अब धुंधली हो चुकी हैं। न वो कपड़े याद हैं, न खिलौने। न स्कूल का बैग याद है, न स्लेट का रंग। लेकिन जो एक याद आज भी सीने में गहराई से बसी हुई है, वो है दादी के कांधे पर बैठकर स्कूल जाना।

सुबह स्कूल जाने का मतलब सिर्फ़ किताबें लेकर जाना नहीं था। असली उत्साह तो उस सफ़र का होता था, जब मैं दादी के कांधे पर होता था — ऊँचाई पर, दुनिया से अलग, बिल्कुल सुरक्षित। स्कूल में पढ़ाई के बीच बार-बार घड़ी की ओर देखता था — ये सोचकर कि कब छुट्टी होगी और मैं फिर से दादी के पास भाग जाऊँगा। उनकी गोद में जो सुकून था, वो आज की दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

आजकल बच्चे अपनी बातें "बेस्ट फ्रेंड" या मोबाइल ऐप्स पर शेयर करते हैं। लेकिन मेरे वक़्त में मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी मेरी दादी।
कभी कोई गलती हो जाए — चाहे स्कूल में टीचर डांटे या घर में माँ-पापा नाराज़ हो जाएँ — एक ही इंसान था जिससे न कुछ छुपाना पड़ता था, न डरना पड़ता था। बस उसके पास बैठ जाना, कुछ भी कह देना — और जैसे हर दुख गायब हो जाता था।

आज दादी हमारे साथ नहीं हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब भी जब मन भारी होता है, आँखें बंद करते ही वही चेहरा सामने आ जाता है।
कभी-कभी अकेले में जब उनसे मन ही मन बातें करता हूँ, तो लगता है जैसे वो सुन रही हैं।
मन हल्का हो जाता है — जैसे बचपन में होता था।

और फिर आते हैं दादाजी —
जिनके हाथों ने सिर्फ़ मेरा हाथ नहीं थामा था, मेरी पूरी सोच गढ़ दी थी।

याद है वो दिन, जब पहली बार स्लेट पर लिखना सीखा था। मेरी नन्ही-नन्ही उँगलियों में पेन्सिल पकड़ाई थी दादाजी ने।
दो उँगलियों के बीच में "अ" लिखने की कोशिश करते वक़्त उनका हाथ मेरे हाथ पर था — वही हाथ जिसने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी की शुरुआत कैसे होती है।

उन्होंने कभी शब्दों में नहीं कहा, लेकिन उनके काम ने सिखाया कि एक आदमी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है — अपने परिवार की ख़ुशी।
उन्होंने जी कर दिखाया कि अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने में जो संतोष है, वो कहीं और नहीं।

दादाजी ने कभी खुद को आगे नहीं रखा, हमेशा परिवार को पहले रखा।
उन्होंने सिखाया कि घर की ख़ुशी ही इंसान की असली दौलत है, और सम्मान पैसों से नहीं, कर्म से कमाया जाता है।


दादी के कांधे और दादाजी के हाथ — यही थे मेरे जीवन के सबसे सुरक्षित स्थान।
और शायद, आज भी वहीं हैं। @Devchandra Thakur

Saturday, October 16, 2021

वर्षो बाद भी ...

 

वर्षो बाद भी ...

अचानक से चाल धीमा हो गया, मानो कदम आगे बढ़ना ही नहीं चाहता है| मगर कदम रुक भी नहीं रहा, शायद दिल रुकना भी नहीं चाहता है। शाम की ठण्ड हवा और लोगों की कदमो के अहाट, कानो में शोर करने लगी| धड़कने तेज़ और आँखे नम होने लगी। लग रहा था पीछे से कोई रोते हुए पुकार रहा है, और वही आवाज़ अचानक से फिर उसे दुत्कार रहा है| मन व्याकुल हो उठा, बगल के दुकान से पानी का एक बोतल लिया और सामने स्ट्रीट लेम्प के निचे वो जा के बैठ गया| 

ऐसा लग रहा था मानो वो जंग में सब कुछ हार के बैठा हो| कई महीने बीत गए थे, उसे लगा था की वो जिंदगी में आगे बढ़ चूका है और सब कुछ ठीक है| प्यार को खोने के बाद वो इतना चिरचिरा बन गया था की धीरे धीरे उसके सारे दोस्तो ने भी उससे दूरिया बना ली थी| वास्तिवकता ये भी था की वो भी सबसे दूर ही रहना चाहता था| एक वक्त था जब वो अवसाद के भवर में बहुत गंदे तरीके से डूब चूका था मगर घर में अपनो के साथ रह के और खुद को सख्ती से बहुत हद तक बदल लिया था| किसी जीव को कष्ट में देख के रो देने वाला, अब खड़े हो के बिना चेहरे पे एक सिकन लाये जल्लाद को चाकू चलाते देख ले, इतना मजबूत कर लिया था दिल को|

मगर आज क्यों वो इंसान इतने महीनो बाद भी उस रास्ते से गुज़र नहीं पाया, जहाँ उसने अपने प्यार से आखरी मुलाकात की थी| जहाँ उसने सोचा था की अपने प्यार से, अपने प्यार का इज़हार करेगा| उसे क्या मालूम था की वो मुलाकात आखिरी है, वक्त कुछ यु पलटेगा की सालो से छिपे भावना को बताने के लिए उसे चंद वक्त भी नसीब न होगा|

काफी देर वो उस जगह बैठा रहा, निहारता रहा वो रास्ता जहाँ वो पहले रोज गुजरा करती थी| हर एक चहेरे में उसे लगता मानो वो ही आ रही हैं जबकि दिल को पता था की वो आ नहीं सकती| पहला बार और आखरी बार का वो मुलाकात, उसके जिंदगी का बसंत जैसा था, ऐसा वसंत जो फिर कभी नहीं आया, मगर हां, बारिश, सर्द और पतझर ताउम्र उसके जिंदगी का हिस्सा बना रहा|

काफी रात हो गयी, दिल भी सिथिल सा हो गया| आँखे भी सुख गयी थी| वो पानी से मुँह धोया और सीधा चलता रहा, बहुत मन कर रहा था की एक आखरी बार पीछे मुड के देख ले उस जगह को लेकिन वो सीधा चलता रहा....




 

Friday, July 12, 2019

शुकुन

बस रोशनी ज्यादा है ए शहर तेरे गलियों में,
मेरे गाँव मे अंधेरा ही सही, सुकून लाजबाव का है।
#Dev