Saturday, July 19, 2025

AI की तेज़ रफ्तार और भारत की धीमी शिक्षा व्यवस्था: अनहोनी के संकेत

"भविष्य वही होता है जिसे हम आज बनाते हैं, लेकिन जब वर्तमान ही गुमराह हो तो भविष्य किस दिशा में जाएगा?"

आज का युग तकनीकी क्रांति का युग है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) — एक ऐसी तकनीक जिसने कुछ ही वर्षों में पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है। जिस कार्य को एक मनुष्य वर्षों की मेहनत और अनुभव से करता है, AI उसे चंद मिनटों में सीखकर उससे बेहतर ढंग से कर रहा है। आज AI एजेंट्स कई मामलों में इंसानों से आगे निकल चुके हैं — निर्णय लेने में, विश्लेषण करने में, और यहां तक कि रचनात्मकता में भी।

AI ने अभी अपने विकास की शुरुआत ही की है, लेकिन इसकी गति को देख कर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जब यह अपने चरम पर होगा तो दुनिया का स्वरूप ही बदल जाएगा। लेकिन ऐसे में एक बड़ा और चिंताजनक सवाल उठता है — क्या हमारे बच्चे, विशेषकर भारत के पिछड़े और ग्रामीण इलाकों के बच्चे, इस तकनीकी बदलाव के लिए तैयार हैं?

ग्रामीण भारत और शिक्षा की सच्चाई

हमारे देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी गांवों और छोटे कस्बों में बसता है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छुपी नहीं है। स्कूलों में अभी तक बुनियादी सुविधाएं — जैसे साफ़ पानी, शौचालय, बिजली — तक उपलब्ध नहीं हैं, तो कंप्यूटर शिक्षा की बात तो दूर की कौड़ी हो गई।

आज के सरकारी स्कूलों में बच्चे कागज़-पेन से पढ़ते हैं, वहीं विकसित देशों में बच्चे रोबोटिक्स और कोडिंग सीख रहे हैं। देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्होंने अब तक कंप्यूटर को छूना तक नहीं सीखा, जबकि उसी उम्र के विदेशी बच्चे AI मॉडल बना रहे हैं। यह अंतर सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई को और चौड़ा कर रहा है।

सरकार की उदासीनता और राजनीतिक स्वार्थ

देश की शिक्षा व्यवस्था को अगर किसी ने सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया है तो वह है राजनीति। हमारे नेताओं की प्राथमिकता कभी भी शिक्षा नहीं रही। शिक्षा में सुधार का वादा हर चुनाव में किया जाता है, लेकिन उसके बाद बस वादाखिलाफी और भ्रष्टाचार देखने को मिलता है।

हर साल शिक्षा के लिए भारी भरकम बजट पास होता है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा भ्रस्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। नेता अपना जेब भरते हैं, ठेकेदार अधूरी इमारतें बनाते हैं, और शिक्षा वहीं की वहीं रह जाती है। अगर कुछ किया भी जाता है तो बस दिखावे के लिए — ताकि वोट लिया जा सके, असली सुधार की नीयत कहीं नहीं दिखती।

AI बनाम Reel: बच्चों की दिशा और चिंता

आज का बच्चा मोबाइल फोन से घिरा हुआ है — शिक्षा नहीं, रील्स और गेम्स में उलझा हुआ। सोशल मीडिया के आभासी चमक-दमक ने सोचने-समझने की क्षमता पर असर डाला है। जब तक शिक्षक बच्चों को AI का उपयोग सिखाएंगे, तब तक बच्चों को तो ये भी नहीं पता होगा कि AI होता क्या है।

ये स्थिति बेहद चिंताजनक है। देश का भविष्य अगर इस तरह के डिजिटल व्यसन में डूब गया, और सही मार्गदर्शन ना मिला, तो हम सिर्फ तकनीकी तौर पर ही नहीं, सामाजिक और मानसिक तौर पर भी पिछड़ जाएंगे।

समाधान की ओर: अब भी समय है

हालात बेशक निराशाजनक हैं, लेकिन पूरी तरह अंधकारमय नहीं। कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जो सरकार, समाज, और हम सभी नागरिकों को मिलकर उठानी होंगी:

  1. शिक्षा को राजनीतिक एजेंडा नहीं, प्राथमिक ज़रूरत मानें।
    बजट और योजनाएं ईमानदारी से लागू हों, यह सुनिश्चित किया जाए।

  2. ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता फैलाना।
    NGOs और टेक कंपनियों को साथ जोड़कर गांवों तक कंप्यूटर, इंटरनेट और AI की मूलभूत समझ पहुंचाई जा सकती है।

  3. शिक्षकों का प्रशिक्षण और नई टेक्नोलॉजी से लैस करना।
    जब तक शिक्षक खुद अपडेट नहीं होंगे, वे बच्चों को कैसे तैयार करेंगे?

  4. बच्चों के लिए सही डिजिटल दिशा तय करना।
    सिर्फ रील्स और गेम्स नहीं, बल्कि बच्चों को कोडिंग, रोबोटिक्स, और सृजनात्मक कार्यों की ओर प्रेरित करना।

AI कोई कल्पना नहीं, यह सच्चाई है — और यह सच्चाई तेज़ी से हमारी दुनिया बदल रही है। ऐसे में यदि हम आज अपनी शिक्षा व्यवस्था को नहीं सुधारते, तो आने वाला समय हमारे बच्चों के लिए सिर्फ संघर्ष और असमानता से भरा होगा।

अब भी समय है।
शुरुआत छोटे स्तर से हो सकती है — एक गांव, एक स्कूल, एक बच्चा। लेकिन अगर इरादा साफ़ है तो बदलाव निश्चित है।

“तकनीक से डरने की नहीं, उसे समझने और अपनाने की ज़रूरत है। लेकिन जब तक समझ होगी नहीं, अपनाएंगे कैसे?”

 पूरा पढ़ने के लिए दिल से धन्यवाद, अपना सुझाव अवश्य दे और एक सबसे जरूरी, इस विषय में एक बार सोचे जरूर। शायद आपके अपने किसी शहर के एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहे है लेकिन वो बच्चे भी अपने ही है जो सरकारी स्कूलों के बीच अपने अबोध मन में सुंदर भविष्य का कल्पना लिए बैठे है। 

🖋देवचंद्र ठाकुर  
📧 thakur.devchandra7@gmail.com


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