साल के बारह महीने…
गाँव के उस छोटे से घर में बैठा मैं, जेब में पड़े सिक्कों को गिन-गिनकर, एक पुराने टिन के डिब्बे में भरता था।
कोई चोरी न कर ले, इसलिए उसे कपड़ों के नीचे, अलमारी के कोने में छुपा देता।
पूरे साल की मेहनत और बचत का मकसद बस एक था — दिवाली का मेला।
उस दिन सोचता, “एक रंगीन पटाखा लूंगा, मीठा पान और अगर पैसे बचे तो गुब्बारा भी।”
हमारे गाँव में खुशियों की कीमत पैसों में नहीं, दानों में मापी जाती थी।
बरफ या सोनपापड़ी के लिए खेत से लाए मकई, धान या गेहूँ देकर मिलता।
आज मैं गाँव से दूर, एक किराए के छोटे से कमरे में अकेला रहता हूँ।
जी-तोड़ मेहनत करता हूँ — दिन में दफ्तर की भाग-दौड़, रात में लैपटॉप पर कोडिंग।
परिवार से दूर, चिंताओं से घिरा, और महंगाई के बोझ तले दबा हुआ।
हर महीने हिसाब लगाता हूँ कि कहां से 2 रुपये भी बचा सकूँ।
लेकिन महंगाई मुझे एक-एक सांस पर टैक्स वसूल लेती है।
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सब्ज़ी पर टैक्स
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बिजली के बिल पर टैक्स
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मोबाइल रिचार्ज पर टैक्स
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और सबसे ऊपर… मेरी मेहनत की कमाई से इनकम टैक्स
इतना टैक्स देने के बाद भी जब गाँव जाता हूँ, दिल बैठ जाता है।
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वही टूटी सड़कें
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वही अंधेरा जब बिजली जाती है
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वही अस्पताल, जिसमें दवाई नहीं
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वही स्कूल, जहां बच्चे टूटी बेंच पर बैठते हैं
मेरे अपने रिश्तेदार आज भी इलाज के लिए शहर भागते हैं।
बच्चे अच्छी पढ़ाई के लिए घर से दूर भेजे जाते हैं।
टैक्स किसके लिए?
टीवी चालू करो, तो देखो —
मंत्री का बेटा विदेश में पढ़ रहा है, बेटी की शादी में करोड़ों के हीरे, और पाँच सितारा होटल में भोज।
विदेशी दौरों पर “अध्ययन यात्रा” के नाम पर मौज-मस्ती।
ये वही लोग हैं, जो चुनाव के वक्त मेरे गाँव में आकर हाथ जोड़ते थे —
"हम गरीबों के सेवक हैं, हमें मौका दो।"
लेकिन सच ये है —
हम अपने लिए नहीं, उनके ऐशो-आराम के लिए कमाते हैं।
रात को अपने छोटे से कमरे में बैठा, चाय की चुस्की लेते हुए मैं सोचता हूँ —
"क्या मेरा टैक्स किसी बच्चे की किताब बनेगा…
या किसी नेता की हवेली की छत?"
और फिर याद आता है —
मेरे गाँव की वो मिट्टी, जहाँ मैंने बचपन में अपने सपनों के लिए 10 रुपया सालभर में जोड़े थे…
आज मेरी पूरी सैलरी से कटे टैक्स के बाद भी, वहाँ ज़िंदगी जस की तस है।
ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं।
ये हर उस इंसान की कहानी है, जो गाँव-शहर में मेहनत करता है, टैक्स देता है… और बदले में टूटी सड़कें, टूटा सिस्टम और टूटे वादे पाता है।
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