Friday, May 30, 2025

 दादी के कांधे और दादाजी के हाथ



पता है, पुरानी हर चीज़ में अगर सबसे प्यारी कोई चीज़ रही है, तो वो है दादी-दादाजी का प्यार।

बचपन की बहुत-सी बातें अब धुंधली हो चुकी हैं। न वो कपड़े याद हैं, न खिलौने। न स्कूल का बैग याद है, न स्लेट का रंग। लेकिन जो एक याद आज भी सीने में गहराई से बसी हुई है, वो है दादी के कांधे पर बैठकर स्कूल जाना।

सुबह स्कूल जाने का मतलब सिर्फ़ किताबें लेकर जाना नहीं था। असली उत्साह तो उस सफ़र का होता था, जब मैं दादी के कांधे पर होता था — ऊँचाई पर, दुनिया से अलग, बिल्कुल सुरक्षित। स्कूल में पढ़ाई के बीच बार-बार घड़ी की ओर देखता था — ये सोचकर कि कब छुट्टी होगी और मैं फिर से दादी के पास भाग जाऊँगा। उनकी गोद में जो सुकून था, वो आज की दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

आजकल बच्चे अपनी बातें "बेस्ट फ्रेंड" या मोबाइल ऐप्स पर शेयर करते हैं। लेकिन मेरे वक़्त में मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी मेरी दादी।
कभी कोई गलती हो जाए — चाहे स्कूल में टीचर डांटे या घर में माँ-पापा नाराज़ हो जाएँ — एक ही इंसान था जिससे न कुछ छुपाना पड़ता था, न डरना पड़ता था। बस उसके पास बैठ जाना, कुछ भी कह देना — और जैसे हर दुख गायब हो जाता था।

आज दादी हमारे साथ नहीं हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब भी जब मन भारी होता है, आँखें बंद करते ही वही चेहरा सामने आ जाता है।
कभी-कभी अकेले में जब उनसे मन ही मन बातें करता हूँ, तो लगता है जैसे वो सुन रही हैं।
मन हल्का हो जाता है — जैसे बचपन में होता था।

और फिर आते हैं दादाजी —
जिनके हाथों ने सिर्फ़ मेरा हाथ नहीं थामा था, मेरी पूरी सोच गढ़ दी थी।

याद है वो दिन, जब पहली बार स्लेट पर लिखना सीखा था। मेरी नन्ही-नन्ही उँगलियों में पेन्सिल पकड़ाई थी दादाजी ने।
दो उँगलियों के बीच में "अ" लिखने की कोशिश करते वक़्त उनका हाथ मेरे हाथ पर था — वही हाथ जिसने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी की शुरुआत कैसे होती है।

उन्होंने कभी शब्दों में नहीं कहा, लेकिन उनके काम ने सिखाया कि एक आदमी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है — अपने परिवार की ख़ुशी।
उन्होंने जी कर दिखाया कि अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने में जो संतोष है, वो कहीं और नहीं।

दादाजी ने कभी खुद को आगे नहीं रखा, हमेशा परिवार को पहले रखा।
उन्होंने सिखाया कि घर की ख़ुशी ही इंसान की असली दौलत है, और सम्मान पैसों से नहीं, कर्म से कमाया जाता है।


दादी के कांधे और दादाजी के हाथ — यही थे मेरे जीवन के सबसे सुरक्षित स्थान।
और शायद, आज भी वहीं हैं। @Devchandra Thakur

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