Friday, May 30, 2025

 शीर्षक: चाँदनी रात और चाँद वाली बूढ़ीया

(19वीं सदी के बिहार के एक गाँव की कहानी)

यह कहानी है 1998-99 के आसपास बिहार के एक छोटे से गाँव की। दिसंबर की सर्द रात थी। आसमान एकदम साफ़ था, जैसे किसी ने नीले काग़ज़ पर दूधिया चाँद को टांग दिया हो। पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा था। न कोई बिजली थी, न कोई रोशनी — बस चाँद की चाँदनी हर घर, हर पेड़, हर खेत को नहला रही थी।

गाँव के एक किनारे पर मिट्टी का एक पुराना सा घर था। उस घर के आँगन में एक छोटा सा लड़का — बबलू — अपने पुराने कम्बल में लिपटा हुआ ज़मीन पर लेटा था। उसकी आँखें आसमान की ओर टिकी थीं। वो चाँद को एकटक निहार रहा था।

उसे अपनी दादी की कही हुई एक कहानी याद आ रही थी —
“चाँद में एक बूढ़ीया रहती है, जो एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठी चरखा कातती रहती है। जब चाँद साफ़ होता है, तो वो बूढ़ीया दिखाई देती है। कभी-कभी वो थककर रुक जाती है, लेकिन उसका चरखा चलता रहता है।”

उसने ध्यान से देखा — और हाँ! उसे चाँद की सतह पर कुछ आकृतियाँ दिखाई दीं। वो आकृति सचमुच किसी पेड़ जैसी थी... और उसके नीचे बैठी एक छोटी सी परछाईं — बिल्कुल वैसी ही जैसी दादी बताया करती थीं — चुपचाप चरखा कातती एक बूढ़ीया।

बबलू का दिल भर आया।
उसे लगा जैसे वह कहानी कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है।

वो सोचने लगा, “क्या सच में चाँद पर कोई है?”
फिर उसकी नज़र आँगन के कोने में फैले एक मकड़ी के जाले पर पड़ी — वो जाला चाँदनी में चमक रहा था, और वो रेशमी धागा किसी चरखे के धागे जैसा लग रहा था।

उसे लगा जैसे वह धागा उसी चाँद वाली बूढ़ीया के चरखे से गिरा हो, जो यहाँ धरती तक चला आया हो — कभी पेड़ की शाख पर लिपटा हुआ, कभी खेतों में पसरा हुआ, कभी दो दीवारों के बीच टँगा हुआ।

उसी रात बबलू ने ठान लिया —
"जब मैं बड़ा होऊँगा, मैं उस बूढ़ीया की कहानी सबको सुनाऊँगा। मैं सबको बताऊँगा कि चाँद सिर्फ़ रौशनी नहीं, वो हमारे बचपन की कहानियों का घर है, हमारी दादी-नानी की कल्पना का जादू है।”

और उस दिन के बाद से हर चाँदनी रात में बबलू चुपचाप आँगन में लेटकर चाँद को निहारता। उसे अब सिर्फ़ चाँद नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया दिखती — जहाँ बूढ़ीया चरखा कातती थी, और उसका धागा बबलू के सपनों में उतरता था।

 दादी के कांधे और दादाजी के हाथ



पता है, पुरानी हर चीज़ में अगर सबसे प्यारी कोई चीज़ रही है, तो वो है दादी-दादाजी का प्यार।

बचपन की बहुत-सी बातें अब धुंधली हो चुकी हैं। न वो कपड़े याद हैं, न खिलौने। न स्कूल का बैग याद है, न स्लेट का रंग। लेकिन जो एक याद आज भी सीने में गहराई से बसी हुई है, वो है दादी के कांधे पर बैठकर स्कूल जाना।

सुबह स्कूल जाने का मतलब सिर्फ़ किताबें लेकर जाना नहीं था। असली उत्साह तो उस सफ़र का होता था, जब मैं दादी के कांधे पर होता था — ऊँचाई पर, दुनिया से अलग, बिल्कुल सुरक्षित। स्कूल में पढ़ाई के बीच बार-बार घड़ी की ओर देखता था — ये सोचकर कि कब छुट्टी होगी और मैं फिर से दादी के पास भाग जाऊँगा। उनकी गोद में जो सुकून था, वो आज की दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

आजकल बच्चे अपनी बातें "बेस्ट फ्रेंड" या मोबाइल ऐप्स पर शेयर करते हैं। लेकिन मेरे वक़्त में मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी मेरी दादी।
कभी कोई गलती हो जाए — चाहे स्कूल में टीचर डांटे या घर में माँ-पापा नाराज़ हो जाएँ — एक ही इंसान था जिससे न कुछ छुपाना पड़ता था, न डरना पड़ता था। बस उसके पास बैठ जाना, कुछ भी कह देना — और जैसे हर दुख गायब हो जाता था।

आज दादी हमारे साथ नहीं हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि अब भी जब मन भारी होता है, आँखें बंद करते ही वही चेहरा सामने आ जाता है।
कभी-कभी अकेले में जब उनसे मन ही मन बातें करता हूँ, तो लगता है जैसे वो सुन रही हैं।
मन हल्का हो जाता है — जैसे बचपन में होता था।

और फिर आते हैं दादाजी —
जिनके हाथों ने सिर्फ़ मेरा हाथ नहीं थामा था, मेरी पूरी सोच गढ़ दी थी।

याद है वो दिन, जब पहली बार स्लेट पर लिखना सीखा था। मेरी नन्ही-नन्ही उँगलियों में पेन्सिल पकड़ाई थी दादाजी ने।
दो उँगलियों के बीच में "अ" लिखने की कोशिश करते वक़्त उनका हाथ मेरे हाथ पर था — वही हाथ जिसने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी की शुरुआत कैसे होती है।

उन्होंने कभी शब्दों में नहीं कहा, लेकिन उनके काम ने सिखाया कि एक आदमी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है — अपने परिवार की ख़ुशी।
उन्होंने जी कर दिखाया कि अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने में जो संतोष है, वो कहीं और नहीं।

दादाजी ने कभी खुद को आगे नहीं रखा, हमेशा परिवार को पहले रखा।
उन्होंने सिखाया कि घर की ख़ुशी ही इंसान की असली दौलत है, और सम्मान पैसों से नहीं, कर्म से कमाया जाता है।


दादी के कांधे और दादाजी के हाथ — यही थे मेरे जीवन के सबसे सुरक्षित स्थान।
और शायद, आज भी वहीं हैं। @Devchandra Thakur