शीर्षक: चाँदनी रात और चाँद वाली बूढ़ीया
(19वीं सदी के बिहार के एक गाँव की कहानी)
यह कहानी है 1998-99 के आसपास बिहार के एक छोटे से गाँव की। दिसंबर की सर्द रात थी। आसमान एकदम साफ़ था, जैसे किसी ने नीले काग़ज़ पर दूधिया चाँद को टांग दिया हो। पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा था। न कोई बिजली थी, न कोई रोशनी — बस चाँद की चाँदनी हर घर, हर पेड़, हर खेत को नहला रही थी।
गाँव के एक किनारे पर मिट्टी का एक पुराना सा घर था। उस घर के आँगन में एक छोटा सा लड़का — बबलू — अपने पुराने कम्बल में लिपटा हुआ ज़मीन पर लेटा था। उसकी आँखें आसमान की ओर टिकी थीं। वो चाँद को एकटक निहार रहा था।
उसे अपनी दादी की कही हुई एक कहानी याद आ रही थी —
“चाँद में एक बूढ़ीया रहती है, जो एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठी चरखा कातती रहती है। जब चाँद साफ़ होता है, तो वो बूढ़ीया दिखाई देती है। कभी-कभी वो थककर रुक जाती है, लेकिन उसका चरखा चलता रहता है।”
उसने ध्यान से देखा — और हाँ! उसे चाँद की सतह पर कुछ आकृतियाँ दिखाई दीं। वो आकृति सचमुच किसी पेड़ जैसी थी... और उसके नीचे बैठी एक छोटी सी परछाईं — बिल्कुल वैसी ही जैसी दादी बताया करती थीं — चुपचाप चरखा कातती एक बूढ़ीया।
बबलू का दिल भर आया।
उसे लगा जैसे वह कहानी कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है।
वो सोचने लगा, “क्या सच में चाँद पर कोई है?”
फिर उसकी नज़र आँगन के कोने में फैले एक मकड़ी के जाले पर पड़ी — वो जाला चाँदनी में चमक रहा था, और वो रेशमी धागा किसी चरखे के धागे जैसा लग रहा था।
उसे लगा जैसे वह धागा उसी चाँद वाली बूढ़ीया के चरखे से गिरा हो, जो यहाँ धरती तक चला आया हो — कभी पेड़ की शाख पर लिपटा हुआ, कभी खेतों में पसरा हुआ, कभी दो दीवारों के बीच टँगा हुआ।
उसी रात बबलू ने ठान लिया —
"जब मैं बड़ा होऊँगा, मैं उस बूढ़ीया की कहानी सबको सुनाऊँगा। मैं सबको बताऊँगा कि चाँद सिर्फ़ रौशनी नहीं, वो हमारे बचपन की कहानियों का घर है, हमारी दादी-नानी की कल्पना का जादू है।”
और उस दिन के बाद से हर चाँदनी रात में बबलू चुपचाप आँगन में लेटकर चाँद को निहारता। उसे अब सिर्फ़ चाँद नहीं, बल्कि एक पूरी दुनिया दिखती — जहाँ बूढ़ीया चरखा कातती थी, और उसका धागा बबलू के सपनों में उतरता था।